Monday, March 7, 2011

A memorable tuesday!

What started as a light hearted banter last tuesday morning with hindi/urdu poetry on facebook turned into a full fledged 'mushaira'(the dictionary describes this as an evening social gathering in which urdu poetry is read,typically taking the form of a contest) session! The exception here was that the participants were neither pros(I had never attempted even hindi poetry earlier but that day I fell in love with the it....and the love affair continues!), nor was it an evening or a physical gathering. It received such an enthusiastic response from friends that there is demand to have another online session for Holi as 'Holi Milan' :) It was an experience extraordinaire!!...went on to show that passion can turn a perfectly ordinary boring day into a once in a lifetime experience.

So I choose to replicate the poetry exchange here(in devanagri script)...unfortunately for obvious reasons I cant include the other general comments of excitement and exuberance, but just the impromptu creativity is worth a mention. The 'participants' here are my friends 
Monika OhsonRashmi Nambiar,Sarita Pandey and me. (Monika & Rashmi reside in Delhi and Sarita & I are based in bangalore). For ease of identification as to who wrote what, their writings will be in in the colors blackredpurple, and blue respectively



ऐ कलम ज़रा रुक रुक के चल,
क्या गज़ब मुकाम आया है 
थोड़ी देर ठहर जा 
तेरी नोख के नीचे यार का नाम आया है !


यार का नाम लिखते ही,
सियाही का रंग बदल जाता है 
आलम ये है की,
कोरे कागज़ में भी अब मुझे तेरा नाम नज़र आता है !


मेरी और दास्तान-ए-यार अब तो चर्चा-ए-आम है
दीवार-ओ-दरख़्त अब सब बस यार के नाम है !



ये कलम भी कमाल की चीज़ है, बेवजह रूमानियत बिखेर देता है,
कोई हमसे आके पूछे , मुहब्बत ने क्या क्या सितम ढाए !

मोहब्बत  के   दिए  सितम  को
हमने  सरताज  बनाया  है
ज़िन्दगी  जीने  का  ये
एक  नया  अंदाज़  बनाया  है !

चचा ग़ालिब कह गए:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

काफ़िर  तो  हो  गया  है  दिल  मेरा
ज़माने  की  सुनता  ही  नहीं
मानता  है  वो सिर्फ  रस्म -ए-उल्फत  को
जहाँ  है  यार ,
बसेरा  है  इस  काफ़िर  का  भी  वहीँ !

दिल की आवारगी का क्या कहें, पहले ही बेतरतीब था
बहाने इश्क-ए-यार, दीवानगी को वजह तो मिली

दीवानगी  की  हद  को  पार  करने  लगा  है  काफ़िर,
चाँद  को  भी  उनका  चेहरा  समझने  लगा  है काफ़िर
लोगों  के  बीच  हम  यूँ  ही  बदनाम  हुए  जाते  है
हर  रात  हमें  छत  पर  खींच  ले  आने  लगा  है  काफ़िर !


मुश्किल था इश्क़ में मरना, अब आसान हो गया है

चाँद और भी खूबसूरत और जवान हो गया है
पुकारना यार का नाम अब अज़ान हो गया है
बदनाम हुए हैं जब से, क्या नाम हो गया है !



सर -ए -आम  हमारी  उल्फत  के  चर्चें  शुरू  हो  गए  हैं
गली ,मोहल्ले  बाज़ार  में  दिल  ढूँढता  है  उन्हें
वोह  न  सही  हर  कदम  पर  हम
उनके  नाम  से  रूबरू  हो  गए  हैं !



क्या बताएँ हम कितने ग़ुस्ताख हो गए

इश्क में हम और भी बेबाक हो गए !



गुस्ताखियों  पे  अपने
इतराते  भी  हम  ही  हैं
महफ़िल  में  जब  नज़र  मिलती  है  उनसे
शरमाते  भी  हम  ही  है !



भरी महफ़िल में भी तुझी पे दिल अटकता है
बजाए सीने के, आँखों में दिल धड़कता है !



दीदार -ए -यार  से  छाया है  मुझपे  मोहब्बत  का  सुरूर
हर  बढती  हुई  धड़कन  से  बढ़ रहा  है  मेरे  आँखों  का  नूर !



अब यूं ना मुझको देखो, अब यूं ना मुस्कराओ

हो जाए ना कहीं फिर इस दिल को आसरा सा !



दिल  को  आसरा  मिल  जाये ,हम  जीने  का  बहाना  ढूँढ लेंगे
खाली जाम  को  भी  हम  भरा  हुआ  पैमाना  समझ  लेंगे !



इतने भी बेदर्द न हो, कि सब्र का पैमाना छलक जाए
कि आपके याद करते करते, हम कँही दूर चले जाए!



ग़म नहीं कि दूर तुझसे जाना है मुझे, आस यही कि बिलकुल भूल जाना है तुझे
इश्क़ मेरा हो गया है कांधे का सलीब, चूम के तेरे होंठ सूली चढ़ जाना है मुझे !



अदना  सा  लब्ज़ -ए -उल्फत  उन  लबों  ने  फ़रमाया  है
ना  जाने  क्यूँ  हमने  उनका  फ़साना  बनाया  है !



चलो छोड़ो ये फ़साना भुला देते हैं हम,
शाम जवान है, एक नयी दास्ताने उल्फत बना लेते हैं हम !



तेरी खूबसूरत बातें, तेरे खूबसूरत फ़साने
तेरे खूबसूरत बहाने, हाए, वो तेरे ज़माने !



ज़मानें  की क्या  हम  करें  बातें
उनसे  ही  रोशन  है  हमारे  दिन  और  हमारी  रातें
क्या  हम  बयां  करें  दास्ताँ -ए -उल्फत
बस  समझ  लो  ये  है  खुदा  की  हम  पे  रहमत !



हर सुबह तेरी ही नज़्म, हर धूप तेरी ही आस
हर शाम तेरे ही गीत, हर शब तेरी ही प्यास !



हर  सांस  तेरे  नाम  से  शुरू
तेरे  नाम  से  ही  ख़तम  कर  लेते  हैं
इश्क -ए -विरासत  मुझे  मिली  है  दीवानगी ,
इसे  भी  हम  खुदा  का  करम  समझ  लेते  है !



मेरी दीवानगी मुझे ज़माने से प्यारी है
मेरे इश्क़ का ज़र्फ़ ज़माने पे भारी है ! 



अजब  असर  है  दीवानगी -ए -इश्क  का ,
आँखे  बंद  करते  हैं  दीदार  के  लिए !



दीवानी की बातों पर कौन यक़ीं करे?
जो यक़ीं किया करते थे वो दीवाने हो गए !



इश्क  की  बस  एक  हवा  चली
और  दीवानों  की  कौम  बना  बैठे !



हवा में उड़ा किये हैं हम, तेरी दीवानगी में
सजदे में झुका किये हैं हम, तेरी दीवानगी में !

2 comments:

  1. awesome, awesome! maza aaya dobara padh ke. keep it going, priya. :)

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  2. these were really good ones...hope to see more and read more...

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